Lakheempur Kheeri : आखिर कब तक यूंही वन्य जीवों का निवाला वनते रहेंगे लोग

आज फिर टाइगर ने वनाया 50वर्षीय मटरू को अपना निवाला

Lakheempur Kheeri : कब दूर  होगी जिले से वन्य-जीवों की दहशत

आदेश शर्मा जिला व्यूरो जनपद लखीमपुर-खीरी

विश्व प्रसिद्ध दुधवा नेशनल पार्क के वफर जोन उत्तर खीरी वन प्रभाग की भीरा रेंज स्थिति भीरा पलिया मार्ग के किनारे बसे ग्राम बोझवा में गन्ना छीलने एक किसान के खेत पर गये किसान मटरू का अधखाया शव मिलने से ग्रामीणों में दहशत फैलगयी


जानकारी के अनुसार भीरा थाना क्षेत्र का निवासी मटरु पुत्र चेतराम उम्र 45 वर्ष बीती दोपहर गन्ना छीलने शारदा नदी के किनारे डेहरी फार्म गया हुआ था जहां पहले से ही मौजूद टाइगर ने उस पर हमला कर दिया
गांव वालों के अनुसार मटरु की चीखें सुनकर पास पड़ोस में काम करने बाले ग्रामीणों और मजदूरों ने भाग कर गांव में आकर टाइगर के हमले की बात बताई और करीब ग्यारह बजे के लगभग वन विभाग की टीम व पुलिस को साथ लेकर मटरू की अधखाया शव बरामद कर लिया
खबर मिलने के बाद डीएओ नार्थ अनिल कुमार व एफडी दुधवा भी मौके पर पहुंच गये
पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है

Nepal Nation  के सीमावर्ती भारत के जिले लखीमपुर खीरी के दुधवा नेशनल पार्क में विगत कुछ वर्षों से जहां एक तरफ विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गये टाइगरों के वंश को पुनर्जीवित करने के प्रयास में अप्रत्याशित सफलता मिली है उससे न केवल उत्तर प्रदेश या भारत में जिले का नाम रौशन हुआ है वल्कि विश्व स्तर पर वन्यजीव प्रेमियों व पर्यटकों में भी खुशी की लहर दौड़ रही है
वहीं दूसरी तरफ इन हिंसक वन्य जीवों की बढ़ती संख्या के चलते इनमे अपना अपना इलाका निर्धारण करने व जल श्रोतों हरी घास के मैदानों जहां पर इनके शिकार हिरन ,जंगली सुवर,चीतल,नीलगाय आदि चरने वाले जीव वहुतायत में रहते हैं ऐसे इलाकों पर अपना कब्जा व दवदवा रखने की होड व लडाइयों के चलते हारा हुआ टाइगर अपना इलाका छोड़ते छोड़ते अंततः: जंगल से बाहर निकल कर खेतो में ही आशियाना वना लेता है वही मादा टाइग्रेस अपने बच्चो की सुरक्षा हेतु जंगल से बाहर निकल कर लगभग दो वर्ष तक बच्चो के बडा होने तक अक्सर खेतों में ही अपना आशियाना वना लेती है और इसके लिये गन्ने के घने खेत टाइगरों को जहां एक तरफ कुदरती आवास सरीखा बातावरण उपलव्ध मिलता है वहीं उनको खेतो में छिप कर रहने वाले जंगली सुबर ,हिरन, सियार,नीलगाय ,और घुमंतू गाय बैल बछड़ा बछिया आदि उनके मन पसंद शिकार भी सहज व सरलता से उपलव्ध रहते हैं
पर वन्य-जीवों की यही सहज पृवत्ति के चलते व वन विभाग की लापरवाही एवं जंगल से सटे इलाकों के ग्रामीणों में जागरूकता की कमी के चलते आते दिन जिले में कहीं न कहीं वन्यजीव मानव संघर्ष की घटना में निरंतर घट रही हैं और लोग मारे जा रहे हैं
वास्तव में देखा जाये तो न जानवरों की कोई गलती है और न ही ग्रामीणों की और न ही वन कर्मियों की
सच बात तो यह है कि जंगल से बाहर निकल कर खेतो में बिचरण करने वाले टाइगरों व अन्य हिंसक वन्य जीवों से सबसे ज्यादा खतरा तो वन रक्षकों को ही उठाना पड़ता है
इस अहम समस्या के जिम्मेदार वास्तव में वह नीति निर्माता हैं जो दिल्ली के पांच सितारा होटलों में बड़े बड़े एसी सालों में बैठ कर टाइगर संरक्षण की योजनाएं बनाते समय जंगली हिंसक जानवरों की आदतों से अपरिचित होते हुवे नये नये नियम कानून लागू करते समय जंगल के किनारे बसी मानव आबादी पर इन वन्य जीवों के हमलों और मौत की घटनाओं को अनदेखा करते हुये टाइगर जैसे हिंसक जानवर से इंसान की मौत की कीमत महज पांच लाख रुपये लगा कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेते हैं
अरबों खरबों के जंगलों बाली वन संपदा के बावजूद इन वन्य जीवों को जंगल के अंदर ही रखने की योजना आखिर क्यों नहीं बनाई जाती जंगल के बाहर निकल कर इंसानी बस्तियों में घूमने वाले वन्य जीवों को तत्काल पकड़ कर वापस जंगल के अंदर पहुंचाने की व्यवस्था क्यों नहीं कराई जाती
अब तक का अनुभव देखें तो जो भी टाइगर जंगल से बाहर आया है कुछ समय के अंतराल पर वहां इंसानों पर हमले जरुर हुये है जिनमे लोग या तो घायल हुये है या मारे गये हैं अब समय आ गया है कि इन हिंसक वन्य जीवों को मानव आबादी से दूर रखने की योजना वना कर इंसानी जिंदगी की कीमत भी समझे टाइगर प्रोजेक्ट्स के नीति निर्माता ऐसी नीति वना में और कोशिश करें कि अब कोई टाइगर या वन्य जीव जंगल से बाहर न निकल सके

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